Saturday, November 16, 2019

#लखनऊ
सिकन्दर बाग
नवाब सआदत अली खान ने सन 1800 में एक बाग लगवाने की शुरुवात की पर इस काम को अमलीजामा पहनाया अवध के आखरी नवाब वाजिद अली शाह ने और इसको अपनी गर्मियों की आरामगाह बनाया । नवाब ने इसका नाम अपनी बेगम सिकन्दर महल के नाम पर सिकन्दर बाग रखा ।
150 एकड़ में फैला यह बाग , और  इसके बीचोबीच एक छोटा सा मंडप ,इसी मंडप में कला प्रेमी नवाब कथक शैली में नृत्य का मंचन करवाते थे । यहीं पर मुशायरे और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे ।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम में ईस्ट इंडिया कम्पनी के सैनिकों से घिरे भारतीय योद्धाओं ने इस बाग में शरण ली थी ।
16 नवम्बर 1857 को ईस्ट इंडिया कम्पनी के सैनिकों और क्रांतिकारियों के बीच यहाँ जबरदस्त युद्ध हुआ था । जिसमें बहुत से कम्पनी के सैनिक मारे गए और 2000 क्रांतिकारी शहीद हुए । लड़ाई के दौरान मारे गए कम्पनी के सिपाहियों को तो दफना दिया गया परन्तु क्रांतिकारियों के शवों को सड़ने के लिए छोड़ दिया गया था । 1858 में फेलिस बीटो ने परिसर के भीतरी हिस्सों की कुख्यात तस्वीर ली थी जिसमें पूरे
बाग में क्रांतिकारियों के बिखरे पड़े कंकालीय अवशेष दिख रहे थे ।
इसी लड़ाई में वीरांगना ऊदा देवी पुरुषों के वस्त्र धारण करके बड़ी वीरता से लड़ी थी जब तक उनके पास गोला बारूद रहा उन्होंने अंग्रेजों को बाग में घुसने नही दिया और वीरगति पाई ।
विकिपीडिया की मदद से लिखा ।
निशिकान्त

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