Saturday, November 16, 2019

#लखनऊ
"जिसको न दे मौला ,
 उसको दे आसिफुद्दौला "
कुछ इस तरह की कहावत सुनने में आती है , पुराने लखनऊ के बुजुर्गों के मुँह से , इसका कारण है, कहते हैं 1784 के आस पास के साल में अवध के आस पास के इलाके में अकाल पड़ा तब नवाब आसफ़ुद्दौला ने अकाल राहत परियोजना के अंतर्गत बड़े इमामबाड़े का निर्माण कराया ।
काम के बदले अनाज योजना का यह सबसे  पहला और बड़ा उदाहरण है । सुनने में यह भी आता है कि दिन में लोग निर्माण करते थे और रात को नवाब की फौजें उसको ढहा देती थी , ताकि निर्माण कार्य लगातार चलता रहे , कहते हैं जब नवाब ने इस कहावत को सुना तो उसने बड़ी विनम्रता से कहा था कि
"जिसको न दे मौला,
उसको क्या दे आसिफुद्दौला "
 इसको आसफी इमामबाड़ा भी कहते हैं ।  इसके वास्तु कार किफ़ायतुल्लाह थे , जो ताजमहल के वास्तुकार के निकटतम सम्बन्धी के रूप में जाने जाते थे । अनुमानतः इसको बनाने में उस समय करीब 10 लाख की लागत आयी थी । इतना ही नही नवाब उसकी साज सज्जा पर हर वर्ष करीब 5 लाख रु खर्च करते थे ।
       इस इमामबाड़े में एक मस्जिद भी है जिसको आसफी मस्जिद कहा जाता है । मस्जिद परिसर के आंगन में दो ऊंची मीनारें हैं ।
बड़े इमामबाड़े के अंदर भुलभुलैया है जो अनचाहे प्रवेश करने वाले को रास्ता भुला कर रोकती थी ।
इमामबाड़ा एक रोचक भवन है । कक्षों के निर्माण और वाल्ट के उपयोग से इसमें शशक्त इस्लामी प्रभाव दिखता है ।
इमामबाड़े का केंद्रीय कक्ष करीब 50 मीटर लम्बा और 16 मीटर चौड़ा है ।
बिना किसी खम्बे की छत करीब 15 मीटर ऊंची है ।यह हॉल लकड़ी , लोहे और पत्थर के बीम के बाहरी सहारे के बिना खड़ी विश्व की सबसे बडी इमारत है , जिसे किसी बीम या गर्डर के बिना ईंटों को आपस में जोड़ कर खड़ा किया गया है ।
इमामबाड़े में तीन विशाल कक्ष हैं, जिसकी दीवारों के बीच लम्बे गलियारे हैं , जो लगभग 20 फुट चौड़ी हैं, यही घनी संरचना भूल भुलैया कहलाती है ।
असल में यहां 1000 से भी अधिक छोटे रास्ते हैं जो देखने में एक जैसे लगते हैं , ये सभी अलग-अलग रास्ते पर निकलते हैं । कुछ तो ऐसे हैं जिनके सिरे बन्द हैं ।
भूल भुलैया की खासियत यह है कि आप किसी कोने में फुसफुसा कर कुछ भी बोलें उसे इसकी दीवार पर कान लगा कर किसी भी कोने में सुना जा सकता है । यही नही इमामबाड़े के मध्य में बने पर्शियन हॉल जिसकी लम्बाई 165 फ़ीट है वहां अगर आप एक कोने में कागज फाड़ें या माचिस जलाएं उसकी आवाज दूसरे कोने में सुनाई देती है । इसका कारण है हॉल में बनी काली - सफेद खोखली लाइनें , जिनके सहारे आवाज एक जगह से दूसरी जगह पहुँचती है ।
भूल भुलैया में एक बावड़ी भी है ,यह बावड़ी गोमती नदी से जुड़ी हुई है ।
जब भी लखनऊ आएं बड़ा इमामबाड़ा देखने जरूर जाएं । पर ध्यान रखें यह एक धर्मिक जगह है , इस कारण कुछ नियम बनाये गए हैं , उसका पालन करें ।
निशिकान्त

No comments:

Post a Comment