Saturday, November 16, 2019

#लखनऊ
कायदे से तो मुझे रूमी दरवाजे के बारे में भी बड़े इमामबाड़े के साथ ही लिखना चाहिए था क्योंकि इसका निर्माण भी नवाब आसिफुद्दौला ने इमामबाड़े के साथ ही अकाल राहत परियोजना में करवाया था पर रूमी दरवाजा इतना खूबसूरत और विशाल है इसीलिये अलग से लिखा ।
कहते हैं कि की इसका नाम 13वीं सदी के महान सूफी फकीर जलाल- अद-दीं मुहम्मद रूमी के नाम पर पड़ा ।
रूमी दरवाजा कान्सटिनपोल के प्राचीन दुर्ग द्वार जैसा दिखता था इसीलिए 19वीं सदी में लोग कुस्तुनतुनिया कह कर पुकारा करते थे । अंग्रेज इसे टर्किश द्वार कहते थे क्योंकि टर्की के सुल्तान के दरबार का प्रवेश गेट कुछ कुछ ऐसा ही था ।
रूमी दरवाजे की ऊंचाई 60 फ़ीट है । इसके ऊपरी हिस्से पर अष्टकार छतरी बनी हुई है ,यहां तक जाने के लिए रास्ता है । पश्चिम की ओर से रूमी दरवाजे की रूपरेखा त्रिपोलिया जैसी और पूर्व से यह पंचमहल जैसा दिखता है ।
दरवाजे के दोनों तरफ तीनमंजिला हवादार परकोटे बने हुए हैं ,जिसके सिरे पर आठ पहलू वाले बुर्ज बने हैं , कभी यहां सैनिक बैठते होंगे ।
अगर ध्यान से देखें तो इसकी आकृति शंख के आकार की दिखती है ।
बाहरी मेहराबों को कमलदल से सजाया गया है । इसके शिखर पर कमल का फूल बना है ।
1858 में न्यूयॉर्क टाइम्स के संवाददाता रसेल ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि रूमी दरवाजे से छत्तर मंजिल तक का रास्ता सबसे खूबसूरत औऱ शानदार है जो लन्दन, रोम, पेरिस और कांस्टेंटिनोपल से भी बेहतर दिखता है ।
कुछ जानकारी Google से ली गई है ।

निशिकान्त

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