#लखनऊ
नवाब सआदत अली खां ने अपने शासन काल में जो इमारतें बनवाई, वे फ्रांसीसी तथा इतालबी स्थापत्य में ढले हुए हैं। ऐसी ही एक खूबसूरत इमारत है सतखंडा।
हुसैनाबाद स्थित सतखंडा पैलेस को अवध के तीसरे बादशाह मुहम्मद अली शाह ने 1842 में बनवाया था।
इसकी खूबी यह है कि इसकी हर मंजिल पर कोण बदल गए हैं और मेहराबों की बनावट भी बदल गई है।
बादशाह चाहते थे कि इस ऊंची इमारत की छत से लखनऊ की शाही इमारतों के वे झुंड देखे जा सकें, जो उस जमाने में बेबीलोन को मात करते थे।
मुहम्मद अली शाह 8 जुलाई 1837 को अवध के तख्ते सल्तनत पर बैठे थे और उसके कुछ ही दिनों बाद उन्होंने नवाब आसफुद्दौला के निवास स्थान, दौलतखाना कदीम के पास अपने हुसैनाबाद की बुनियाद डाल दी थी।
उन्होंने कई खूबसूरत इमारतें बनवाईं लेकिन अफसोस कि वह सतखंडा को बने हुए नहीं देख सके। नवाब नौखंडा पैलेस, जुम्मा मस्जिद और बारादरी भी नहीं देख पाए थे।
नवाबी दस्तूर था कि जिस इमारत को बनवाने वाला बीच में मर जाता था, तो उसे मनहूस करार देकर उसे ज्यों का त्यों ही छोड़ दिया जाता था।
भले ही यह इमारत आज खंडहर में तब्दील हो रही हो लेकिन इसकी खूबसूरती के मायने कहीं से भी कम नजर नहीं आते।
निशिकान्त
Nishikant Mishra
नवाब सआदत अली खां ने अपने शासन काल में जो इमारतें बनवाई, वे फ्रांसीसी तथा इतालबी स्थापत्य में ढले हुए हैं। ऐसी ही एक खूबसूरत इमारत है सतखंडा।
हुसैनाबाद स्थित सतखंडा पैलेस को अवध के तीसरे बादशाह मुहम्मद अली शाह ने 1842 में बनवाया था।
इसकी खूबी यह है कि इसकी हर मंजिल पर कोण बदल गए हैं और मेहराबों की बनावट भी बदल गई है।
बादशाह चाहते थे कि इस ऊंची इमारत की छत से लखनऊ की शाही इमारतों के वे झुंड देखे जा सकें, जो उस जमाने में बेबीलोन को मात करते थे।
मुहम्मद अली शाह 8 जुलाई 1837 को अवध के तख्ते सल्तनत पर बैठे थे और उसके कुछ ही दिनों बाद उन्होंने नवाब आसफुद्दौला के निवास स्थान, दौलतखाना कदीम के पास अपने हुसैनाबाद की बुनियाद डाल दी थी।
उन्होंने कई खूबसूरत इमारतें बनवाईं लेकिन अफसोस कि वह सतखंडा को बने हुए नहीं देख सके। नवाब नौखंडा पैलेस, जुम्मा मस्जिद और बारादरी भी नहीं देख पाए थे।
नवाबी दस्तूर था कि जिस इमारत को बनवाने वाला बीच में मर जाता था, तो उसे मनहूस करार देकर उसे ज्यों का त्यों ही छोड़ दिया जाता था।
भले ही यह इमारत आज खंडहर में तब्दील हो रही हो लेकिन इसकी खूबसूरती के मायने कहीं से भी कम नजर नहीं आते।
निशिकान्त
Nishikant Mishra

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