Saturday, November 16, 2019

#लखनऊ
नवाब आसिफुद्दौला के एक दीवान राजा टिकैत राय थे । जाति के कायस्थ राजा टिकैत राय बहुत धर्म परायण थे । उन्होंने टिकैत गंज में शीतला देवी के मंदिर के निकट एक भव्य तालाब बनवाया जो कि लखौड़ी ईंट का बना वर्गाकार सीढ़ी नुमा तालाब था । इस पर स्त्रियों के नहाने के लिए अलग पर्देदार घाट बना था । इसी के किनारे लखनऊ के प्रसिद्ध आठों का मेला लगता था । जो शायद अब भी लगता है , पर नवाबों के समय में उस मेले की बात ही और थी , उसका विवरण इतिहास में है । कई इतिहासकारों ने आठों मेले के बारे में लिखा है । बड़े बड़े नवाब पालकियों में बैठ कर आते थे तालाब के किनारे जन मनोरंजन का इंतजाम होता था ।
बड़ा अफसोस होता है इस तालाब को देख कर 1985 -86 में यह तालाब कुछ ठीक हालत में था मैंने उस समय इसको इसके मूल रूप में देखा था । जिसमे भले ही गन्दा पानी था पर पानी था । तालाब का मूल स्वरूप बरकरार था । अब तालाब तो नही रहा वह  , कोई भी पुरानी फोटो नही मिली अफसोस ।
निशिकान्त
#लखनऊ
#तारा_वाली_कोठी
दो -तीन दिन पहले जरूरी काम से स्टेट बैंक की मेन ब्रांच में जाना हुआ , ब्रांच के बाहर लगा पत्थर " तारा वाली कोठी " देख कर जानने की उत्सुकता हुई मालूम किया किताबे खंगाली तो "तारा वाली कोठी " का इतिहास मिला ।
अवध के नवाब नसीरुद्दीन हैदर द्वितीय को ज्योतिष से बड़ा लगाव था जिसने उन्हें खगोल शास्त्र की तरफ आकृष्ट किया इसीलिए उन्होंने एक उच्च कोटि की वेधशाला का निर्माण करवाया जो "तारा वाली कोठी" के नाम से मशहूर हुई । यह फ्रांस के प्रसिद्ध स्थापत्य के नमूने पर बना चौकोर भवन है ।
इस वेधशाला के लिए नवाब ने विदेशों से बड़ी-बड़ी दूरबीनें और खगोल यंत्र मंगवाए और कर्नल वेलकावस को प्रमुख खगोल शास्त्री नियुक्त किया गया । नवाब नसीरुद्दीन हैदर की मृत्यु के बाद 1847 तक यह वेधशाला चलती रही पर 1847 में कर्नल साहब की मृत्यु के बाद नवाब वाजिद अली शाह ने उनकी जगह कोई दूसरा खगोल विज्ञानी नियुक्त नही किया । और कीमती यंत्र और दूरबीनें बेकार पड़ी रही ।
1857 की क्रांति में मौलवी अहमदउल्ला शाह ने तारा वाली कोठी को अपना ठिकाना बनाया और यहीं से पूरे युद्ध का संचालन किया । इसी आपाधापी में दूरबीनें और यंत्र या तो गायब हो गए या युद्ध की भेंट चढ़ गए ।
बाद में इसी इमारत में इम्पीरियल बैंक खुला जो आजादी के बाद स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की लखनऊ की मुख्य शाखा है ।
निशिकान्त
#लखनऊ
लखनऊ का ऐतिहासिक घंटाघर कुछ ख़ास है। हुसैनाबाद घंटाघर इमामबाड़ा के ठीक सामने स्थित है। भारत के सबसे ऊंचे इस घंटाघर की उचाई 67 मीटर यानी 221 फीट है।
इस घंटाघर का निर्माण 1887 में करवाया गया था। इसे रास्‍केल पायने ने डिजायन किया था। यह टॉवर भारत में विक्‍टोरियन-गोथिक शैली की वास्‍तुकला का शानदार उदाहरण है। इसके निर्माण की शुरुआत नवाब नसीर-उद-दीन ने 1881 में की थी। अवध के पहले संयुक्‍त प्रांत के लेफ्टिनेंट गर्वनर जॉर्ज काउपर के स्‍वागत में 1887 इसका निर्माण पूरा हुआ था। उन दिनों इस घंटाघर पर 1.74 लाख की लागत लगी थी। हैरत की बात यह है कि 221 फ़ीट की इस ईमारत में समर्थन के लिए कोई भी खम्बा शामिल नहीं है।
लंदन के बिग बेन के तर्ज इसका निर्माण किया गया था। कहा जाता है कि इस घंटाघर के पहिये बिग बेन से ज़्यादा बड़े है। साथ ही इस घंटाघर में लगी घड़ी की सुईयां बंदूक धातु की बनी हुई हैं। इसे लंदन के लुईगेट हिल से लाया गया था। चौदह फीट लंबा और डेढ़ इंच मोटा पेंडुलम, लंदन की वेस्‍टमिनस्‍टर क्‍लॉक की तुलना में बड़ा है। इसमें घंटे के आसपास फूलों की पंखुडियों के आकार पर बेल्‍स लगी हुई हैं,  जो हर 1 घंटे बाद बजती है। घड़ी के स्पेयर पार्ट्स सदियों से वैसे ही हैं, जो ठेठ भारतीय कठोर मौसम की स्थिति का सामना करने की क्षमता रखते हैं।
हालांकि 1984 में इसकी घड़ियां रुक गयी थीं। बाद में इसे सही किया गया ।
निशिकान्त
#लखनऊ
#नवाब_वाजिद_अली_शाह (अख्तर)

"तुमने कैसर बाग को तो देखा तो होगा बारहा !
आज भी आती है जिससे ' हाय अख्तर ' की सदा !!"

कुछ इस तरह लिखा है मशहूर शायर जोश मलिहाबादी साहेब ने नवाब वाजिद अली शाह 'अख्तर' के लिए ।
अवध के पांचवें नवाब, नवाब अमजद अली खां के दूसरे पुत्र वाजिद अली खां का जन्म 30 जुलाई 1822 को हुआ था । अंग्रजों से लुटे पिटे अवध की गद्दी उनको 13 फरवरी 1847 को मिली ।
नवाब वाजिद अली शाह को अंग्रेजों ने अवध का राज्य हड़पने के लिए बदनाम तो बहुत किया , पर अपनी बुराइयां तो वह खुद लिख गए थे । आइए नवाब वाजिद अली शाह की उपलब्धियां देंखे । जैसे ही वाजिद अली शाह ने शासन सम्भाला वह रोज दोपहर को अपनी फ़ौजों की सलामी लेने लगे जिसको देख कर कम्पनी के अधिकारियों के हाथ पांव फूलने लगे उन्होंने षडयंत्र करके इसको किसी तरह रुकवाया ।

" मोरे कान्हा जो आये पलट के अबके होरी मैं खेलूंगी डट के....."
यह ऐतिहासिक ठुमरी नवाब वाजिद अली शाह अख्तर की लिखी हुई है ,वैसे नवाब वाजिद अली शाह को ठुमरी का जन्मदाता भी माना जाता है ।
कहा जाता है कि एक बार मुहर्रम और होली एक ही दिन पड़ गए और हिंदुओं ने होली नही खेली जब यह बात नवाब को पता चली तो उन्होंने फरमान जारी कर दिया कि हिन्दू और मुसलमान सब होली खेलेंगे ,यह घटना नवाब के सेकुलर होने की गवाह है ।
लखनऊ में जिस इमारत में आज भातखण्डे संगीत विद्यालय चलता है कभी वह नवाब वाजिद अली शाह का परीखाना हुआ करता था जहाँ नवाब की परियाँ रहती थी जहाँ उनको संगीत और नृत्य की तालीम दी जाती थी , नवाब खुद भी संगीत और नृत्य की शिक्षा लेते थे । नवाब के जीवन में बहुत सी स्त्रियां इसी परीखाने से आई , जिनमे से एक बेगम हजरत महल थी ।
वाजिद अली शाह ने अनेक कविताओं, गद्य, राग, नाटक और गजलों में महारथ हासिल किया था। हालांकि उनकी प्रसिद्ध रचनाओं जैसे भैरवी ठुमरी ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए’ जिसे कई प्रमुख गायकों द्वारा गाया गया है, उनके राग (जोगी, जुही, शाह-पसंद आदि), नाट्य कविताएं (दरिया-ए-तश्क, अफसाना-ए-इश्क, बहारे-ए-उलफत) और गजल (दीवाने-अख्तर, हुसैन-ए-अख्तर) हैं और वाजिद अली के इन महान कार्यों ने कलाकारों और नाटक कारों को प्रेरित किया है। नवाब वाजिद अली शाह कला के प्रति अपने जुनून को लेकर काफी महत्वाकांक्षी थे ।
आज अवधी कुजीन जिस मुकाम पर है, उसके लिए नवाब वाजिद अली शाह के योगदान को नहीं भूला जा सकता । खुद कल्पना करते हुए देखिये मिलेगा कि वाजिद अली शाह के जीवन में कितनी विविधताएं हैं । यदि हम नवाब के जीवन से कुछ बुराइयों को फ़िल्टर कर दें तो हमारे लिए ये कहना गलत नहीं है, कि नवाब वाजिद अली शाह अपने दौर में अवध के लियोनार्डो दा विंची थे, अगर नहीं थे उनसे कम भी नहीं थे ।
जब अंग्रजों द्वारा सत्ता छीने जाने पर नवाब वाजिद अली शाह कलकत्ता जा रहे थे तो उनकी प्रजा अपने "अख्तर"पिया की ठुमरी  " बाबुल मोरो नैहर छूटो जाए ....." गाकर रो रही थी , और नवाब अपनी पालकी में यह शेर बोल कर हमेशा हमेशा के लिए लखनऊ छोड़ गए !
" दरो दीवार पे हसरत से नजर करते हैं,
खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते हैं"!!
निशिकान्त
#लखनऊ
सिकन्दर बाग
नवाब सआदत अली खान ने सन 1800 में एक बाग लगवाने की शुरुवात की पर इस काम को अमलीजामा पहनाया अवध के आखरी नवाब वाजिद अली शाह ने और इसको अपनी गर्मियों की आरामगाह बनाया । नवाब ने इसका नाम अपनी बेगम सिकन्दर महल के नाम पर सिकन्दर बाग रखा ।
150 एकड़ में फैला यह बाग , और  इसके बीचोबीच एक छोटा सा मंडप ,इसी मंडप में कला प्रेमी नवाब कथक शैली में नृत्य का मंचन करवाते थे । यहीं पर मुशायरे और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे ।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम में ईस्ट इंडिया कम्पनी के सैनिकों से घिरे भारतीय योद्धाओं ने इस बाग में शरण ली थी ।
16 नवम्बर 1857 को ईस्ट इंडिया कम्पनी के सैनिकों और क्रांतिकारियों के बीच यहाँ जबरदस्त युद्ध हुआ था । जिसमें बहुत से कम्पनी के सैनिक मारे गए और 2000 क्रांतिकारी शहीद हुए । लड़ाई के दौरान मारे गए कम्पनी के सिपाहियों को तो दफना दिया गया परन्तु क्रांतिकारियों के शवों को सड़ने के लिए छोड़ दिया गया था । 1858 में फेलिस बीटो ने परिसर के भीतरी हिस्सों की कुख्यात तस्वीर ली थी जिसमें पूरे
बाग में क्रांतिकारियों के बिखरे पड़े कंकालीय अवशेष दिख रहे थे ।
इसी लड़ाई में वीरांगना ऊदा देवी पुरुषों के वस्त्र धारण करके बड़ी वीरता से लड़ी थी जब तक उनके पास गोला बारूद रहा उन्होंने अंग्रेजों को बाग में घुसने नही दिया और वीरगति पाई ।
विकिपीडिया की मदद से लिखा ।
निशिकान्त
#लखनऊ
नवाब सआदत अली खां ने अपने शासन काल में जो इमारतें बनवाई, वे फ्रांसीसी तथा इतालबी स्थापत्य में ढले हुए हैं। ऐसी ही एक खूबसूरत इमारत है सतखंडा।

हुसैनाबाद स्थित सतखंडा पैलेस को अवध के तीसरे बादशाह मुहम्मद अली शाह ने 1842 में बनवाया था।

इसकी खूबी यह है कि इसकी हर मंजिल पर कोण बदल गए हैं और मेहराबों की बनावट भी बदल गई है।

बादशाह चाहते थे कि इस ऊंची इमारत की छत से लखनऊ की शाही इमारतों के वे झुंड देखे जा सकें, जो उस जमाने में बेबीलोन को मात करते थे।

मुहम्मद अली शाह 8 जुलाई 1837 को अवध के तख्ते सल्तनत पर बैठे थे और उसके कुछ ही दिनों बाद उन्होंने नवाब आसफुद्दौला के निवास स्थान, दौलतखाना कदीम के पास अपने हुसैनाबाद की बुनियाद डाल दी थी।

उन्होंने कई खूबसूरत इमारतें बनवाईं लेकिन अफसोस कि वह सतखंडा को बने हुए नहीं देख सके। नवाब नौखंडा पैलेस, जुम्मा मस्जिद और बारादरी भी नहीं देख पाए थे।

नवाबी दस्तूर था कि जिस इमारत को बनवाने वाला बीच में मर जाता था, तो उसे मनहूस करार देकर उसे ज्यों का त्यों ही छोड़ दिया जाता था।

भले ही यह इमारत आज खंडहर में तब्दील हो रही हो लेकिन इसकी खूबसूरती के मायने कहीं से भी कम नजर नहीं आते।
निशिकान्त
Nishikant Mishra
#लखनऊ
अद्भुत नजाकत के लिए मशहूर , शानो-शौकत भरे नवाबी शहर लखनऊ में आलीशान ईमारतों के बीच एक ऐसा वीरान खंडहर खड़ा है जो कभी अंग्रेजी हुकूमत का नवाबी गढ़ हुआ करता था ।
आइए इतिहास में देखते हैं कि कब क्या हुआ ।
1764 में अवध के नवाब की " बक्सर की लड़ाई " में अंग्रेजों से हार के बाद अंग्रेजों ने अवध के दरबार में ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया । कम्पनी प्रतिनिधि जिसको रेजिडेंट कहते थे , उसका मकसद था नवाब और कम्पनी बहादुर के बीच गलतफहमियों को दूर करना और दोस्ताना माहौल बनाना । ये बात और है कि अंग्रेजों से की गई दोस्ती अवध रियासत की जिंदगी और मौत का सबब बन गई ।
जब नवाब आसिफुद्दौला अपनी राजधानी फैजाबाद से लखनऊ लाये तो नवाब ने कुछ बंगले नुमा घर कम्पनी रेजिडेंट के लिए बनवाये , यही जगह रेजीडेंसी कहलाई । मेजर जनरल क्लाड मार्टिन ने भी आस पास की जमीन खरीद कर और भव्य बंगले बना कर उनको अंग्रेजों , व्यापारियों , और धनी लोगों को बेचा या किराए पर दिया , यह पूरा क्षेत्र करीब 33 एकड़ का था ।
ज्यों - ज्यों रेजिडेंट का रुतबा बढ़ता गया रेजीडेंसी की भव्यता बढ़ती गई और उसका विस्तार होता गया ।
रेजीडेंसी के पूर्व दिशा में गोमती के किनारे क्लाड मार्टिन ने एक भव्य महल बनवाया इसे कोठी फरहद बख्श के नाम से जाना गया । यह कोठी नवाब को इतनी पसन्द आई कि उन्होंने इसको खरीद लिया और नवाब का घर और दरबार यहीं आ गया ।
पर अवध के आखरी नवाब वाजिद अली शाह ने रेजीडेंसी से कुछ अलग हट कर महल बनवा कर अपना दौलत खाना बनाया उस जगह को अब कैसर बाग कहते हैं ।
7 फरवरी 1856 को अंग्रेजों ने नवाब वाजिद अली शाह से सत्ता छीन ली ।
फिर 1857 की क्रांति में फैजाबाद के मौलवी अहमदउल्ला शाह की अगुवाई में क्रांतिकारियों ने रेजीडेंसी के चारों तरफ घेरा डाल दिया । क्रांतिकारियों ने रेजीडेंसी पर प्रचंड हमले किये और लगातार हमलों से रेजीडेंसी के मकान ध्वस्त होते रहे ,और रेजीडेंसी में भुखमरी के हालात पैदा हो गए  ।
कानपुर से अंग्रेजों की मदद को आये जनरल कैम्पबेल ने 22 नवम्बर 1857 को किसी तरह से वहाँ से अंग्रेजों को बाहर निकाला ।
इसके एक साल बाद ही अंग्रेज लखनऊ जीत पाए ।
86 दिनों की रेजीडेंसी की घेराबंदी और दीवारों पर तोप के गोलों के निशान हिंदुस्तानियों द्वारा बहादुरी से लड़े गए युद्ध का प्रतीक हैं । दूसरी तरफ जो अंग्रजों के नाम कब्रों पर लिखे हैं वो अंग्रेजों द्वारा रेजीडेंसी को बचाने के कौशल का प्रतीक हैं ।
#खंडहर_बता_रहे_हैं_कि_इमारत_बुलन्द_थी
निशिकान्त
#लखनऊ
कायदे से तो मुझे रूमी दरवाजे के बारे में भी बड़े इमामबाड़े के साथ ही लिखना चाहिए था क्योंकि इसका निर्माण भी नवाब आसिफुद्दौला ने इमामबाड़े के साथ ही अकाल राहत परियोजना में करवाया था पर रूमी दरवाजा इतना खूबसूरत और विशाल है इसीलिये अलग से लिखा ।
कहते हैं कि की इसका नाम 13वीं सदी के महान सूफी फकीर जलाल- अद-दीं मुहम्मद रूमी के नाम पर पड़ा ।
रूमी दरवाजा कान्सटिनपोल के प्राचीन दुर्ग द्वार जैसा दिखता था इसीलिए 19वीं सदी में लोग कुस्तुनतुनिया कह कर पुकारा करते थे । अंग्रेज इसे टर्किश द्वार कहते थे क्योंकि टर्की के सुल्तान के दरबार का प्रवेश गेट कुछ कुछ ऐसा ही था ।
रूमी दरवाजे की ऊंचाई 60 फ़ीट है । इसके ऊपरी हिस्से पर अष्टकार छतरी बनी हुई है ,यहां तक जाने के लिए रास्ता है । पश्चिम की ओर से रूमी दरवाजे की रूपरेखा त्रिपोलिया जैसी और पूर्व से यह पंचमहल जैसा दिखता है ।
दरवाजे के दोनों तरफ तीनमंजिला हवादार परकोटे बने हुए हैं ,जिसके सिरे पर आठ पहलू वाले बुर्ज बने हैं , कभी यहां सैनिक बैठते होंगे ।
अगर ध्यान से देखें तो इसकी आकृति शंख के आकार की दिखती है ।
बाहरी मेहराबों को कमलदल से सजाया गया है । इसके शिखर पर कमल का फूल बना है ।
1858 में न्यूयॉर्क टाइम्स के संवाददाता रसेल ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि रूमी दरवाजे से छत्तर मंजिल तक का रास्ता सबसे खूबसूरत औऱ शानदार है जो लन्दन, रोम, पेरिस और कांस्टेंटिनोपल से भी बेहतर दिखता है ।
कुछ जानकारी Google से ली गई है ।

निशिकान्त
#लखनऊ
"जिसको न दे मौला ,
 उसको दे आसिफुद्दौला "
कुछ इस तरह की कहावत सुनने में आती है , पुराने लखनऊ के बुजुर्गों के मुँह से , इसका कारण है, कहते हैं 1784 के आस पास के साल में अवध के आस पास के इलाके में अकाल पड़ा तब नवाब आसफ़ुद्दौला ने अकाल राहत परियोजना के अंतर्गत बड़े इमामबाड़े का निर्माण कराया ।
काम के बदले अनाज योजना का यह सबसे  पहला और बड़ा उदाहरण है । सुनने में यह भी आता है कि दिन में लोग निर्माण करते थे और रात को नवाब की फौजें उसको ढहा देती थी , ताकि निर्माण कार्य लगातार चलता रहे , कहते हैं जब नवाब ने इस कहावत को सुना तो उसने बड़ी विनम्रता से कहा था कि
"जिसको न दे मौला,
उसको क्या दे आसिफुद्दौला "
 इसको आसफी इमामबाड़ा भी कहते हैं ।  इसके वास्तु कार किफ़ायतुल्लाह थे , जो ताजमहल के वास्तुकार के निकटतम सम्बन्धी के रूप में जाने जाते थे । अनुमानतः इसको बनाने में उस समय करीब 10 लाख की लागत आयी थी । इतना ही नही नवाब उसकी साज सज्जा पर हर वर्ष करीब 5 लाख रु खर्च करते थे ।
       इस इमामबाड़े में एक मस्जिद भी है जिसको आसफी मस्जिद कहा जाता है । मस्जिद परिसर के आंगन में दो ऊंची मीनारें हैं ।
बड़े इमामबाड़े के अंदर भुलभुलैया है जो अनचाहे प्रवेश करने वाले को रास्ता भुला कर रोकती थी ।
इमामबाड़ा एक रोचक भवन है । कक्षों के निर्माण और वाल्ट के उपयोग से इसमें शशक्त इस्लामी प्रभाव दिखता है ।
इमामबाड़े का केंद्रीय कक्ष करीब 50 मीटर लम्बा और 16 मीटर चौड़ा है ।
बिना किसी खम्बे की छत करीब 15 मीटर ऊंची है ।यह हॉल लकड़ी , लोहे और पत्थर के बीम के बाहरी सहारे के बिना खड़ी विश्व की सबसे बडी इमारत है , जिसे किसी बीम या गर्डर के बिना ईंटों को आपस में जोड़ कर खड़ा किया गया है ।
इमामबाड़े में तीन विशाल कक्ष हैं, जिसकी दीवारों के बीच लम्बे गलियारे हैं , जो लगभग 20 फुट चौड़ी हैं, यही घनी संरचना भूल भुलैया कहलाती है ।
असल में यहां 1000 से भी अधिक छोटे रास्ते हैं जो देखने में एक जैसे लगते हैं , ये सभी अलग-अलग रास्ते पर निकलते हैं । कुछ तो ऐसे हैं जिनके सिरे बन्द हैं ।
भूल भुलैया की खासियत यह है कि आप किसी कोने में फुसफुसा कर कुछ भी बोलें उसे इसकी दीवार पर कान लगा कर किसी भी कोने में सुना जा सकता है । यही नही इमामबाड़े के मध्य में बने पर्शियन हॉल जिसकी लम्बाई 165 फ़ीट है वहां अगर आप एक कोने में कागज फाड़ें या माचिस जलाएं उसकी आवाज दूसरे कोने में सुनाई देती है । इसका कारण है हॉल में बनी काली - सफेद खोखली लाइनें , जिनके सहारे आवाज एक जगह से दूसरी जगह पहुँचती है ।
भूल भुलैया में एक बावड़ी भी है ,यह बावड़ी गोमती नदी से जुड़ी हुई है ।
जब भी लखनऊ आएं बड़ा इमामबाड़ा देखने जरूर जाएं । पर ध्यान रखें यह एक धर्मिक जगह है , इस कारण कुछ नियम बनाये गए हैं , उसका पालन करें ।
निशिकान्त
#लखनऊ
सन 1870 में विजयनगरम के महाराजा कृष्णदेव राय ने लखनऊ में एक मेडिकल कालेज खोलने की सोची लेकिन धन की कमी के कारण यह न हो सका । सन 1905 में प्रिंस ऑफ वेल्स भारत यात्रा के समय 21 दिसम्बर 1905 को मेडिकल कालेज की नींव रखी गई ।
इसके लिए जहांगीराबाद के राजा सर तसदुक रसूल ने अयोध्या के राजा की मदद से प्रयास किये थे ।
इसका निर्माण सिरेनिक शैली में किया गया , इमारत तैयार होने के बाद इसका शुभारंभ किंग जार्ज पंचम औऱ क्वीन मेरी के भारत आने के अवसर पर किया गया और किंग के नाम पर ही इसका नाम " किंग जार्ज मेडिकल कालेज " रखा गया ।
अक्टूबर 1911 में यहाँ 31 छात्रों का पहला बैच शुरू किया गया , कर्नल डब्ल्यू सेल्बी, मेडिकल कालेज के पहले प्रिंसपल बने , 5 प्रोफेसर और 2 लेक्चरर के साथ यहाँ पढ़ाई शुरू हुई और 1916 में पहला बैच यहाँ से पास होकर निकला ।
साल 1921 में लखनऊ यूनिवर्सिटी की शुरुवात के बाद " किंग जार्ज मेडिकल कालेज" को लखनऊ यूनिवर्सिटी से सम्बद्ध कर दिया गया , उसी वर्ष यहाँ 226 बेड का एक अस्पताल खोला गया जिसका नाम      " किंग जार्ज हॉस्पिटल" रखा गया लखनऊ यूनिवर्सिटी की स्थापना के बाद मेडिकल कालेज का दीक्षांत समारोह 1922 में रखा गया जिसमें कलकत्ता के तत्कालीन वाइस चांसलर को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया गया ।
साल 1931 में क्वीन मेरी हॉस्पिटल और 1949 में डेंटल फेकल्टी की शुरुवात हुई ।
तमाम उतार- चढावों के बाद आज यह देश के प्रतिष्ठित मेडिकल कालेजों में से एक है । यहाँ पढ़ने वाले "जार्जियन" कहलाते हैं
निशिकान्त
#लखनऊ
हजरतगंज में घूमने को लखनऊ में गंजिग कहा जाता है । गंजिंग हजरतगंज चौराहे से शुरू होकर हलवासिया तक होती है । लखनवी मिजाज की खास पहचान है गंजिंग । कहते हैं 1960 में जब लखनऊ में जबरदस्त बाढ़ आई और हजरतगंज में कमर तक पानी भर गया तब भी गंज के दीवाने नावों में सवार होकर हजरतगंज पहुंचते थे ।
       हजरतगंज करीब 200 साल पुराना है । इसे नवाब सआदत अली खान ने यूरोपियन स्टाइल में बनवाया था । शुरू-शुरू में इसे मुनव्वर बक्श कहा जाता था। 1842 में इसका नाम बदल कर अमजद अली शाह के नाम पर रख दिया गया । नवाब अमजद अली " हजरत" के नाम से मशहूर थे इसी लिए इसका नाम हजरतगंज हो गया ।
   हजरतगंज कोठी हयात बक्श ( आज का राज भवन ) से शुरू होकर कोठी नूर बक्श ( आज का डी एम बंगला ) पर खत्म होता था ।
असल में गंजिग कोठी हयात बक्श से ही शुरू होती थी क्योंकि उसके पीछे की तरफ केंट एरिया था वहीं से गोरी मेम और  अंग्रेज साहब निकल कर गंजिग करने आते और कोठी नूर बक्श पर खत्म करते ।
चलिए दीवाली की रोशनी में गंजिंग का मजा लिया जाए और लखनवी नजाकत महसूस की जाए ।
निशिकान्त