Saturday, November 16, 2019

#लखनऊ
#नवाब_वाजिद_अली_शाह (अख्तर)

"तुमने कैसर बाग को तो देखा तो होगा बारहा !
आज भी आती है जिससे ' हाय अख्तर ' की सदा !!"

कुछ इस तरह लिखा है मशहूर शायर जोश मलिहाबादी साहेब ने नवाब वाजिद अली शाह 'अख्तर' के लिए ।
अवध के पांचवें नवाब, नवाब अमजद अली खां के दूसरे पुत्र वाजिद अली खां का जन्म 30 जुलाई 1822 को हुआ था । अंग्रजों से लुटे पिटे अवध की गद्दी उनको 13 फरवरी 1847 को मिली ।
नवाब वाजिद अली शाह को अंग्रेजों ने अवध का राज्य हड़पने के लिए बदनाम तो बहुत किया , पर अपनी बुराइयां तो वह खुद लिख गए थे । आइए नवाब वाजिद अली शाह की उपलब्धियां देंखे । जैसे ही वाजिद अली शाह ने शासन सम्भाला वह रोज दोपहर को अपनी फ़ौजों की सलामी लेने लगे जिसको देख कर कम्पनी के अधिकारियों के हाथ पांव फूलने लगे उन्होंने षडयंत्र करके इसको किसी तरह रुकवाया ।

" मोरे कान्हा जो आये पलट के अबके होरी मैं खेलूंगी डट के....."
यह ऐतिहासिक ठुमरी नवाब वाजिद अली शाह अख्तर की लिखी हुई है ,वैसे नवाब वाजिद अली शाह को ठुमरी का जन्मदाता भी माना जाता है ।
कहा जाता है कि एक बार मुहर्रम और होली एक ही दिन पड़ गए और हिंदुओं ने होली नही खेली जब यह बात नवाब को पता चली तो उन्होंने फरमान जारी कर दिया कि हिन्दू और मुसलमान सब होली खेलेंगे ,यह घटना नवाब के सेकुलर होने की गवाह है ।
लखनऊ में जिस इमारत में आज भातखण्डे संगीत विद्यालय चलता है कभी वह नवाब वाजिद अली शाह का परीखाना हुआ करता था जहाँ नवाब की परियाँ रहती थी जहाँ उनको संगीत और नृत्य की तालीम दी जाती थी , नवाब खुद भी संगीत और नृत्य की शिक्षा लेते थे । नवाब के जीवन में बहुत सी स्त्रियां इसी परीखाने से आई , जिनमे से एक बेगम हजरत महल थी ।
वाजिद अली शाह ने अनेक कविताओं, गद्य, राग, नाटक और गजलों में महारथ हासिल किया था। हालांकि उनकी प्रसिद्ध रचनाओं जैसे भैरवी ठुमरी ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए’ जिसे कई प्रमुख गायकों द्वारा गाया गया है, उनके राग (जोगी, जुही, शाह-पसंद आदि), नाट्य कविताएं (दरिया-ए-तश्क, अफसाना-ए-इश्क, बहारे-ए-उलफत) और गजल (दीवाने-अख्तर, हुसैन-ए-अख्तर) हैं और वाजिद अली के इन महान कार्यों ने कलाकारों और नाटक कारों को प्रेरित किया है। नवाब वाजिद अली शाह कला के प्रति अपने जुनून को लेकर काफी महत्वाकांक्षी थे ।
आज अवधी कुजीन जिस मुकाम पर है, उसके लिए नवाब वाजिद अली शाह के योगदान को नहीं भूला जा सकता । खुद कल्पना करते हुए देखिये मिलेगा कि वाजिद अली शाह के जीवन में कितनी विविधताएं हैं । यदि हम नवाब के जीवन से कुछ बुराइयों को फ़िल्टर कर दें तो हमारे लिए ये कहना गलत नहीं है, कि नवाब वाजिद अली शाह अपने दौर में अवध के लियोनार्डो दा विंची थे, अगर नहीं थे उनसे कम भी नहीं थे ।
जब अंग्रजों द्वारा सत्ता छीने जाने पर नवाब वाजिद अली शाह कलकत्ता जा रहे थे तो उनकी प्रजा अपने "अख्तर"पिया की ठुमरी  " बाबुल मोरो नैहर छूटो जाए ....." गाकर रो रही थी , और नवाब अपनी पालकी में यह शेर बोल कर हमेशा हमेशा के लिए लखनऊ छोड़ गए !
" दरो दीवार पे हसरत से नजर करते हैं,
खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते हैं"!!
निशिकान्त

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