#लखनऊ
हजरतगंज में घूमने को लखनऊ में गंजिग कहा जाता है । गंजिंग हजरतगंज चौराहे से शुरू होकर हलवासिया तक होती है । लखनवी मिजाज की खास पहचान है गंजिंग । कहते हैं 1960 में जब लखनऊ में जबरदस्त बाढ़ आई और हजरतगंज में कमर तक पानी भर गया तब भी गंज के दीवाने नावों में सवार होकर हजरतगंज पहुंचते थे ।
हजरतगंज करीब 200 साल पुराना है । इसे नवाब सआदत अली खान ने यूरोपियन स्टाइल में बनवाया था । शुरू-शुरू में इसे मुनव्वर बक्श कहा जाता था। 1842 में इसका नाम बदल कर अमजद अली शाह के नाम पर रख दिया गया । नवाब अमजद अली " हजरत" के नाम से मशहूर थे इसी लिए इसका नाम हजरतगंज हो गया ।
हजरतगंज कोठी हयात बक्श ( आज का राज भवन ) से शुरू होकर कोठी नूर बक्श ( आज का डी एम बंगला ) पर खत्म होता था ।
असल में गंजिग कोठी हयात बक्श से ही शुरू होती थी क्योंकि उसके पीछे की तरफ केंट एरिया था वहीं से गोरी मेम और अंग्रेज साहब निकल कर गंजिग करने आते और कोठी नूर बक्श पर खत्म करते ।
चलिए दीवाली की रोशनी में गंजिंग का मजा लिया जाए और लखनवी नजाकत महसूस की जाए ।
निशिकान्त
हजरतगंज में घूमने को लखनऊ में गंजिग कहा जाता है । गंजिंग हजरतगंज चौराहे से शुरू होकर हलवासिया तक होती है । लखनवी मिजाज की खास पहचान है गंजिंग । कहते हैं 1960 में जब लखनऊ में जबरदस्त बाढ़ आई और हजरतगंज में कमर तक पानी भर गया तब भी गंज के दीवाने नावों में सवार होकर हजरतगंज पहुंचते थे ।
हजरतगंज करीब 200 साल पुराना है । इसे नवाब सआदत अली खान ने यूरोपियन स्टाइल में बनवाया था । शुरू-शुरू में इसे मुनव्वर बक्श कहा जाता था। 1842 में इसका नाम बदल कर अमजद अली शाह के नाम पर रख दिया गया । नवाब अमजद अली " हजरत" के नाम से मशहूर थे इसी लिए इसका नाम हजरतगंज हो गया ।
हजरतगंज कोठी हयात बक्श ( आज का राज भवन ) से शुरू होकर कोठी नूर बक्श ( आज का डी एम बंगला ) पर खत्म होता था ।
असल में गंजिग कोठी हयात बक्श से ही शुरू होती थी क्योंकि उसके पीछे की तरफ केंट एरिया था वहीं से गोरी मेम और अंग्रेज साहब निकल कर गंजिग करने आते और कोठी नूर बक्श पर खत्म करते ।
चलिए दीवाली की रोशनी में गंजिंग का मजा लिया जाए और लखनवी नजाकत महसूस की जाए ।
निशिकान्त

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