Saturday, November 16, 2019

#लखनऊ
नवाब आसिफुद्दौला के एक दीवान राजा टिकैत राय थे । जाति के कायस्थ राजा टिकैत राय बहुत धर्म परायण थे । उन्होंने टिकैत गंज में शीतला देवी के मंदिर के निकट एक भव्य तालाब बनवाया जो कि लखौड़ी ईंट का बना वर्गाकार सीढ़ी नुमा तालाब था । इस पर स्त्रियों के नहाने के लिए अलग पर्देदार घाट बना था । इसी के किनारे लखनऊ के प्रसिद्ध आठों का मेला लगता था । जो शायद अब भी लगता है , पर नवाबों के समय में उस मेले की बात ही और थी , उसका विवरण इतिहास में है । कई इतिहासकारों ने आठों मेले के बारे में लिखा है । बड़े बड़े नवाब पालकियों में बैठ कर आते थे तालाब के किनारे जन मनोरंजन का इंतजाम होता था ।
बड़ा अफसोस होता है इस तालाब को देख कर 1985 -86 में यह तालाब कुछ ठीक हालत में था मैंने उस समय इसको इसके मूल रूप में देखा था । जिसमे भले ही गन्दा पानी था पर पानी था । तालाब का मूल स्वरूप बरकरार था । अब तालाब तो नही रहा वह  , कोई भी पुरानी फोटो नही मिली अफसोस ।
निशिकान्त
#लखनऊ
#तारा_वाली_कोठी
दो -तीन दिन पहले जरूरी काम से स्टेट बैंक की मेन ब्रांच में जाना हुआ , ब्रांच के बाहर लगा पत्थर " तारा वाली कोठी " देख कर जानने की उत्सुकता हुई मालूम किया किताबे खंगाली तो "तारा वाली कोठी " का इतिहास मिला ।
अवध के नवाब नसीरुद्दीन हैदर द्वितीय को ज्योतिष से बड़ा लगाव था जिसने उन्हें खगोल शास्त्र की तरफ आकृष्ट किया इसीलिए उन्होंने एक उच्च कोटि की वेधशाला का निर्माण करवाया जो "तारा वाली कोठी" के नाम से मशहूर हुई । यह फ्रांस के प्रसिद्ध स्थापत्य के नमूने पर बना चौकोर भवन है ।
इस वेधशाला के लिए नवाब ने विदेशों से बड़ी-बड़ी दूरबीनें और खगोल यंत्र मंगवाए और कर्नल वेलकावस को प्रमुख खगोल शास्त्री नियुक्त किया गया । नवाब नसीरुद्दीन हैदर की मृत्यु के बाद 1847 तक यह वेधशाला चलती रही पर 1847 में कर्नल साहब की मृत्यु के बाद नवाब वाजिद अली शाह ने उनकी जगह कोई दूसरा खगोल विज्ञानी नियुक्त नही किया । और कीमती यंत्र और दूरबीनें बेकार पड़ी रही ।
1857 की क्रांति में मौलवी अहमदउल्ला शाह ने तारा वाली कोठी को अपना ठिकाना बनाया और यहीं से पूरे युद्ध का संचालन किया । इसी आपाधापी में दूरबीनें और यंत्र या तो गायब हो गए या युद्ध की भेंट चढ़ गए ।
बाद में इसी इमारत में इम्पीरियल बैंक खुला जो आजादी के बाद स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की लखनऊ की मुख्य शाखा है ।
निशिकान्त
#लखनऊ
लखनऊ का ऐतिहासिक घंटाघर कुछ ख़ास है। हुसैनाबाद घंटाघर इमामबाड़ा के ठीक सामने स्थित है। भारत के सबसे ऊंचे इस घंटाघर की उचाई 67 मीटर यानी 221 फीट है।
इस घंटाघर का निर्माण 1887 में करवाया गया था। इसे रास्‍केल पायने ने डिजायन किया था। यह टॉवर भारत में विक्‍टोरियन-गोथिक शैली की वास्‍तुकला का शानदार उदाहरण है। इसके निर्माण की शुरुआत नवाब नसीर-उद-दीन ने 1881 में की थी। अवध के पहले संयुक्‍त प्रांत के लेफ्टिनेंट गर्वनर जॉर्ज काउपर के स्‍वागत में 1887 इसका निर्माण पूरा हुआ था। उन दिनों इस घंटाघर पर 1.74 लाख की लागत लगी थी। हैरत की बात यह है कि 221 फ़ीट की इस ईमारत में समर्थन के लिए कोई भी खम्बा शामिल नहीं है।
लंदन के बिग बेन के तर्ज इसका निर्माण किया गया था। कहा जाता है कि इस घंटाघर के पहिये बिग बेन से ज़्यादा बड़े है। साथ ही इस घंटाघर में लगी घड़ी की सुईयां बंदूक धातु की बनी हुई हैं। इसे लंदन के लुईगेट हिल से लाया गया था। चौदह फीट लंबा और डेढ़ इंच मोटा पेंडुलम, लंदन की वेस्‍टमिनस्‍टर क्‍लॉक की तुलना में बड़ा है। इसमें घंटे के आसपास फूलों की पंखुडियों के आकार पर बेल्‍स लगी हुई हैं,  जो हर 1 घंटे बाद बजती है। घड़ी के स्पेयर पार्ट्स सदियों से वैसे ही हैं, जो ठेठ भारतीय कठोर मौसम की स्थिति का सामना करने की क्षमता रखते हैं।
हालांकि 1984 में इसकी घड़ियां रुक गयी थीं। बाद में इसे सही किया गया ।
निशिकान्त
#लखनऊ
#नवाब_वाजिद_अली_शाह (अख्तर)

"तुमने कैसर बाग को तो देखा तो होगा बारहा !
आज भी आती है जिससे ' हाय अख्तर ' की सदा !!"

कुछ इस तरह लिखा है मशहूर शायर जोश मलिहाबादी साहेब ने नवाब वाजिद अली शाह 'अख्तर' के लिए ।
अवध के पांचवें नवाब, नवाब अमजद अली खां के दूसरे पुत्र वाजिद अली खां का जन्म 30 जुलाई 1822 को हुआ था । अंग्रजों से लुटे पिटे अवध की गद्दी उनको 13 फरवरी 1847 को मिली ।
नवाब वाजिद अली शाह को अंग्रेजों ने अवध का राज्य हड़पने के लिए बदनाम तो बहुत किया , पर अपनी बुराइयां तो वह खुद लिख गए थे । आइए नवाब वाजिद अली शाह की उपलब्धियां देंखे । जैसे ही वाजिद अली शाह ने शासन सम्भाला वह रोज दोपहर को अपनी फ़ौजों की सलामी लेने लगे जिसको देख कर कम्पनी के अधिकारियों के हाथ पांव फूलने लगे उन्होंने षडयंत्र करके इसको किसी तरह रुकवाया ।

" मोरे कान्हा जो आये पलट के अबके होरी मैं खेलूंगी डट के....."
यह ऐतिहासिक ठुमरी नवाब वाजिद अली शाह अख्तर की लिखी हुई है ,वैसे नवाब वाजिद अली शाह को ठुमरी का जन्मदाता भी माना जाता है ।
कहा जाता है कि एक बार मुहर्रम और होली एक ही दिन पड़ गए और हिंदुओं ने होली नही खेली जब यह बात नवाब को पता चली तो उन्होंने फरमान जारी कर दिया कि हिन्दू और मुसलमान सब होली खेलेंगे ,यह घटना नवाब के सेकुलर होने की गवाह है ।
लखनऊ में जिस इमारत में आज भातखण्डे संगीत विद्यालय चलता है कभी वह नवाब वाजिद अली शाह का परीखाना हुआ करता था जहाँ नवाब की परियाँ रहती थी जहाँ उनको संगीत और नृत्य की तालीम दी जाती थी , नवाब खुद भी संगीत और नृत्य की शिक्षा लेते थे । नवाब के जीवन में बहुत सी स्त्रियां इसी परीखाने से आई , जिनमे से एक बेगम हजरत महल थी ।
वाजिद अली शाह ने अनेक कविताओं, गद्य, राग, नाटक और गजलों में महारथ हासिल किया था। हालांकि उनकी प्रसिद्ध रचनाओं जैसे भैरवी ठुमरी ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए’ जिसे कई प्रमुख गायकों द्वारा गाया गया है, उनके राग (जोगी, जुही, शाह-पसंद आदि), नाट्य कविताएं (दरिया-ए-तश्क, अफसाना-ए-इश्क, बहारे-ए-उलफत) और गजल (दीवाने-अख्तर, हुसैन-ए-अख्तर) हैं और वाजिद अली के इन महान कार्यों ने कलाकारों और नाटक कारों को प्रेरित किया है। नवाब वाजिद अली शाह कला के प्रति अपने जुनून को लेकर काफी महत्वाकांक्षी थे ।
आज अवधी कुजीन जिस मुकाम पर है, उसके लिए नवाब वाजिद अली शाह के योगदान को नहीं भूला जा सकता । खुद कल्पना करते हुए देखिये मिलेगा कि वाजिद अली शाह के जीवन में कितनी विविधताएं हैं । यदि हम नवाब के जीवन से कुछ बुराइयों को फ़िल्टर कर दें तो हमारे लिए ये कहना गलत नहीं है, कि नवाब वाजिद अली शाह अपने दौर में अवध के लियोनार्डो दा विंची थे, अगर नहीं थे उनसे कम भी नहीं थे ।
जब अंग्रजों द्वारा सत्ता छीने जाने पर नवाब वाजिद अली शाह कलकत्ता जा रहे थे तो उनकी प्रजा अपने "अख्तर"पिया की ठुमरी  " बाबुल मोरो नैहर छूटो जाए ....." गाकर रो रही थी , और नवाब अपनी पालकी में यह शेर बोल कर हमेशा हमेशा के लिए लखनऊ छोड़ गए !
" दरो दीवार पे हसरत से नजर करते हैं,
खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते हैं"!!
निशिकान्त
#लखनऊ
सिकन्दर बाग
नवाब सआदत अली खान ने सन 1800 में एक बाग लगवाने की शुरुवात की पर इस काम को अमलीजामा पहनाया अवध के आखरी नवाब वाजिद अली शाह ने और इसको अपनी गर्मियों की आरामगाह बनाया । नवाब ने इसका नाम अपनी बेगम सिकन्दर महल के नाम पर सिकन्दर बाग रखा ।
150 एकड़ में फैला यह बाग , और  इसके बीचोबीच एक छोटा सा मंडप ,इसी मंडप में कला प्रेमी नवाब कथक शैली में नृत्य का मंचन करवाते थे । यहीं पर मुशायरे और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे ।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम में ईस्ट इंडिया कम्पनी के सैनिकों से घिरे भारतीय योद्धाओं ने इस बाग में शरण ली थी ।
16 नवम्बर 1857 को ईस्ट इंडिया कम्पनी के सैनिकों और क्रांतिकारियों के बीच यहाँ जबरदस्त युद्ध हुआ था । जिसमें बहुत से कम्पनी के सैनिक मारे गए और 2000 क्रांतिकारी शहीद हुए । लड़ाई के दौरान मारे गए कम्पनी के सिपाहियों को तो दफना दिया गया परन्तु क्रांतिकारियों के शवों को सड़ने के लिए छोड़ दिया गया था । 1858 में फेलिस बीटो ने परिसर के भीतरी हिस्सों की कुख्यात तस्वीर ली थी जिसमें पूरे
बाग में क्रांतिकारियों के बिखरे पड़े कंकालीय अवशेष दिख रहे थे ।
इसी लड़ाई में वीरांगना ऊदा देवी पुरुषों के वस्त्र धारण करके बड़ी वीरता से लड़ी थी जब तक उनके पास गोला बारूद रहा उन्होंने अंग्रेजों को बाग में घुसने नही दिया और वीरगति पाई ।
विकिपीडिया की मदद से लिखा ।
निशिकान्त
#लखनऊ
नवाब सआदत अली खां ने अपने शासन काल में जो इमारतें बनवाई, वे फ्रांसीसी तथा इतालबी स्थापत्य में ढले हुए हैं। ऐसी ही एक खूबसूरत इमारत है सतखंडा।

हुसैनाबाद स्थित सतखंडा पैलेस को अवध के तीसरे बादशाह मुहम्मद अली शाह ने 1842 में बनवाया था।

इसकी खूबी यह है कि इसकी हर मंजिल पर कोण बदल गए हैं और मेहराबों की बनावट भी बदल गई है।

बादशाह चाहते थे कि इस ऊंची इमारत की छत से लखनऊ की शाही इमारतों के वे झुंड देखे जा सकें, जो उस जमाने में बेबीलोन को मात करते थे।

मुहम्मद अली शाह 8 जुलाई 1837 को अवध के तख्ते सल्तनत पर बैठे थे और उसके कुछ ही दिनों बाद उन्होंने नवाब आसफुद्दौला के निवास स्थान, दौलतखाना कदीम के पास अपने हुसैनाबाद की बुनियाद डाल दी थी।

उन्होंने कई खूबसूरत इमारतें बनवाईं लेकिन अफसोस कि वह सतखंडा को बने हुए नहीं देख सके। नवाब नौखंडा पैलेस, जुम्मा मस्जिद और बारादरी भी नहीं देख पाए थे।

नवाबी दस्तूर था कि जिस इमारत को बनवाने वाला बीच में मर जाता था, तो उसे मनहूस करार देकर उसे ज्यों का त्यों ही छोड़ दिया जाता था।

भले ही यह इमारत आज खंडहर में तब्दील हो रही हो लेकिन इसकी खूबसूरती के मायने कहीं से भी कम नजर नहीं आते।
निशिकान्त
Nishikant Mishra
#लखनऊ
अद्भुत नजाकत के लिए मशहूर , शानो-शौकत भरे नवाबी शहर लखनऊ में आलीशान ईमारतों के बीच एक ऐसा वीरान खंडहर खड़ा है जो कभी अंग्रेजी हुकूमत का नवाबी गढ़ हुआ करता था ।
आइए इतिहास में देखते हैं कि कब क्या हुआ ।
1764 में अवध के नवाब की " बक्सर की लड़ाई " में अंग्रेजों से हार के बाद अंग्रेजों ने अवध के दरबार में ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया । कम्पनी प्रतिनिधि जिसको रेजिडेंट कहते थे , उसका मकसद था नवाब और कम्पनी बहादुर के बीच गलतफहमियों को दूर करना और दोस्ताना माहौल बनाना । ये बात और है कि अंग्रेजों से की गई दोस्ती अवध रियासत की जिंदगी और मौत का सबब बन गई ।
जब नवाब आसिफुद्दौला अपनी राजधानी फैजाबाद से लखनऊ लाये तो नवाब ने कुछ बंगले नुमा घर कम्पनी रेजिडेंट के लिए बनवाये , यही जगह रेजीडेंसी कहलाई । मेजर जनरल क्लाड मार्टिन ने भी आस पास की जमीन खरीद कर और भव्य बंगले बना कर उनको अंग्रेजों , व्यापारियों , और धनी लोगों को बेचा या किराए पर दिया , यह पूरा क्षेत्र करीब 33 एकड़ का था ।
ज्यों - ज्यों रेजिडेंट का रुतबा बढ़ता गया रेजीडेंसी की भव्यता बढ़ती गई और उसका विस्तार होता गया ।
रेजीडेंसी के पूर्व दिशा में गोमती के किनारे क्लाड मार्टिन ने एक भव्य महल बनवाया इसे कोठी फरहद बख्श के नाम से जाना गया । यह कोठी नवाब को इतनी पसन्द आई कि उन्होंने इसको खरीद लिया और नवाब का घर और दरबार यहीं आ गया ।
पर अवध के आखरी नवाब वाजिद अली शाह ने रेजीडेंसी से कुछ अलग हट कर महल बनवा कर अपना दौलत खाना बनाया उस जगह को अब कैसर बाग कहते हैं ।
7 फरवरी 1856 को अंग्रेजों ने नवाब वाजिद अली शाह से सत्ता छीन ली ।
फिर 1857 की क्रांति में फैजाबाद के मौलवी अहमदउल्ला शाह की अगुवाई में क्रांतिकारियों ने रेजीडेंसी के चारों तरफ घेरा डाल दिया । क्रांतिकारियों ने रेजीडेंसी पर प्रचंड हमले किये और लगातार हमलों से रेजीडेंसी के मकान ध्वस्त होते रहे ,और रेजीडेंसी में भुखमरी के हालात पैदा हो गए  ।
कानपुर से अंग्रेजों की मदद को आये जनरल कैम्पबेल ने 22 नवम्बर 1857 को किसी तरह से वहाँ से अंग्रेजों को बाहर निकाला ।
इसके एक साल बाद ही अंग्रेज लखनऊ जीत पाए ।
86 दिनों की रेजीडेंसी की घेराबंदी और दीवारों पर तोप के गोलों के निशान हिंदुस्तानियों द्वारा बहादुरी से लड़े गए युद्ध का प्रतीक हैं । दूसरी तरफ जो अंग्रजों के नाम कब्रों पर लिखे हैं वो अंग्रेजों द्वारा रेजीडेंसी को बचाने के कौशल का प्रतीक हैं ।
#खंडहर_बता_रहे_हैं_कि_इमारत_बुलन्द_थी
निशिकान्त