#लखनऊ
अद्भुत नजाकत के लिए मशहूर , शानो-शौकत भरे नवाबी शहर लखनऊ में आलीशान ईमारतों के बीच एक ऐसा वीरान खंडहर खड़ा है जो कभी अंग्रेजी हुकूमत का नवाबी गढ़ हुआ करता था ।
आइए इतिहास में देखते हैं कि कब क्या हुआ ।
1764 में अवध के नवाब की " बक्सर की लड़ाई " में अंग्रेजों से हार के बाद अंग्रेजों ने अवध के दरबार में ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया । कम्पनी प्रतिनिधि जिसको रेजिडेंट कहते थे , उसका मकसद था नवाब और कम्पनी बहादुर के बीच गलतफहमियों को दूर करना और दोस्ताना माहौल बनाना । ये बात और है कि अंग्रेजों से की गई दोस्ती अवध रियासत की जिंदगी और मौत का सबब बन गई ।
जब नवाब आसिफुद्दौला अपनी राजधानी फैजाबाद से लखनऊ लाये तो नवाब ने कुछ बंगले नुमा घर कम्पनी रेजिडेंट के लिए बनवाये , यही जगह रेजीडेंसी कहलाई । मेजर जनरल क्लाड मार्टिन ने भी आस पास की जमीन खरीद कर और भव्य बंगले बना कर उनको अंग्रेजों , व्यापारियों , और धनी लोगों को बेचा या किराए पर दिया , यह पूरा क्षेत्र करीब 33 एकड़ का था ।
ज्यों - ज्यों रेजिडेंट का रुतबा बढ़ता गया रेजीडेंसी की भव्यता बढ़ती गई और उसका विस्तार होता गया ।
रेजीडेंसी के पूर्व दिशा में गोमती के किनारे क्लाड मार्टिन ने एक भव्य महल बनवाया इसे कोठी फरहद बख्श के नाम से जाना गया । यह कोठी नवाब को इतनी पसन्द आई कि उन्होंने इसको खरीद लिया और नवाब का घर और दरबार यहीं आ गया ।
पर अवध के आखरी नवाब वाजिद अली शाह ने रेजीडेंसी से कुछ अलग हट कर महल बनवा कर अपना दौलत खाना बनाया उस जगह को अब कैसर बाग कहते हैं ।
7 फरवरी 1856 को अंग्रेजों ने नवाब वाजिद अली शाह से सत्ता छीन ली ।
फिर 1857 की क्रांति में फैजाबाद के मौलवी अहमदउल्ला शाह की अगुवाई में क्रांतिकारियों ने रेजीडेंसी के चारों तरफ घेरा डाल दिया । क्रांतिकारियों ने रेजीडेंसी पर प्रचंड हमले किये और लगातार हमलों से रेजीडेंसी के मकान ध्वस्त होते रहे ,और रेजीडेंसी में भुखमरी के हालात पैदा हो गए ।
कानपुर से अंग्रेजों की मदद को आये जनरल कैम्पबेल ने 22 नवम्बर 1857 को किसी तरह से वहाँ से अंग्रेजों को बाहर निकाला ।
इसके एक साल बाद ही अंग्रेज लखनऊ जीत पाए ।
86 दिनों की रेजीडेंसी की घेराबंदी और दीवारों पर तोप के गोलों के निशान हिंदुस्तानियों द्वारा बहादुरी से लड़े गए युद्ध का प्रतीक हैं । दूसरी तरफ जो अंग्रजों के नाम कब्रों पर लिखे हैं वो अंग्रेजों द्वारा रेजीडेंसी को बचाने के कौशल का प्रतीक हैं ।
#खंडहर_बता_रहे_हैं_कि_इमारत_बुलन्द_थी
निशिकान्त
अद्भुत नजाकत के लिए मशहूर , शानो-शौकत भरे नवाबी शहर लखनऊ में आलीशान ईमारतों के बीच एक ऐसा वीरान खंडहर खड़ा है जो कभी अंग्रेजी हुकूमत का नवाबी गढ़ हुआ करता था ।
आइए इतिहास में देखते हैं कि कब क्या हुआ ।
1764 में अवध के नवाब की " बक्सर की लड़ाई " में अंग्रेजों से हार के बाद अंग्रेजों ने अवध के दरबार में ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया । कम्पनी प्रतिनिधि जिसको रेजिडेंट कहते थे , उसका मकसद था नवाब और कम्पनी बहादुर के बीच गलतफहमियों को दूर करना और दोस्ताना माहौल बनाना । ये बात और है कि अंग्रेजों से की गई दोस्ती अवध रियासत की जिंदगी और मौत का सबब बन गई ।
जब नवाब आसिफुद्दौला अपनी राजधानी फैजाबाद से लखनऊ लाये तो नवाब ने कुछ बंगले नुमा घर कम्पनी रेजिडेंट के लिए बनवाये , यही जगह रेजीडेंसी कहलाई । मेजर जनरल क्लाड मार्टिन ने भी आस पास की जमीन खरीद कर और भव्य बंगले बना कर उनको अंग्रेजों , व्यापारियों , और धनी लोगों को बेचा या किराए पर दिया , यह पूरा क्षेत्र करीब 33 एकड़ का था ।
ज्यों - ज्यों रेजिडेंट का रुतबा बढ़ता गया रेजीडेंसी की भव्यता बढ़ती गई और उसका विस्तार होता गया ।
रेजीडेंसी के पूर्व दिशा में गोमती के किनारे क्लाड मार्टिन ने एक भव्य महल बनवाया इसे कोठी फरहद बख्श के नाम से जाना गया । यह कोठी नवाब को इतनी पसन्द आई कि उन्होंने इसको खरीद लिया और नवाब का घर और दरबार यहीं आ गया ।
पर अवध के आखरी नवाब वाजिद अली शाह ने रेजीडेंसी से कुछ अलग हट कर महल बनवा कर अपना दौलत खाना बनाया उस जगह को अब कैसर बाग कहते हैं ।
7 फरवरी 1856 को अंग्रेजों ने नवाब वाजिद अली शाह से सत्ता छीन ली ।
फिर 1857 की क्रांति में फैजाबाद के मौलवी अहमदउल्ला शाह की अगुवाई में क्रांतिकारियों ने रेजीडेंसी के चारों तरफ घेरा डाल दिया । क्रांतिकारियों ने रेजीडेंसी पर प्रचंड हमले किये और लगातार हमलों से रेजीडेंसी के मकान ध्वस्त होते रहे ,और रेजीडेंसी में भुखमरी के हालात पैदा हो गए ।
कानपुर से अंग्रेजों की मदद को आये जनरल कैम्पबेल ने 22 नवम्बर 1857 को किसी तरह से वहाँ से अंग्रेजों को बाहर निकाला ।
इसके एक साल बाद ही अंग्रेज लखनऊ जीत पाए ।
86 दिनों की रेजीडेंसी की घेराबंदी और दीवारों पर तोप के गोलों के निशान हिंदुस्तानियों द्वारा बहादुरी से लड़े गए युद्ध का प्रतीक हैं । दूसरी तरफ जो अंग्रजों के नाम कब्रों पर लिखे हैं वो अंग्रेजों द्वारा रेजीडेंसी को बचाने के कौशल का प्रतीक हैं ।
#खंडहर_बता_रहे_हैं_कि_इमारत_बुलन्द_थी
निशिकान्त

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